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गीता प्रेस, गोरखपुर >> शीघ्र कल्याण के सोपान

शीघ्र कल्याण के सोपान

जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :218
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1074
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है शीघ्र कल्याण के सोपान...

Shighra Kalyan Ke Sopan a hindi book by Jaidayal Goyandaka - शीघ्र कल्याण के सोपान - जयदयाल गोयन्दका

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।।श्रीहरि:।।

निवेदन

तत्त्व चिन्तामणि के पहले भाग की भूमिका में यह आशा प्रकट की गयी थी कि ‘इस सरल भाषा में लिखी हुई तत्त्वपूर्ण पुस्तक का अच्छा आदर होगा और लोग इससे विशेष लाभ उठायेंगे।’ आनन्द की बात है कि वह आशा विफल नहीं हुई। तत्त्व चिन्तामणि का वह पहला भाग शीघ्र ही समाप्त हो गया और अब उसका दूसरा संशोधित संस्करण भी निकल गया है। यह ग्रन्थ उसी का दूसरा भाग है। पहले भाग की अपेक्षा इसमें प्राय: दूने पृष्ठ हैं। तत्त्व-ज्ञान के बहुत ऊँचे सिद्धान्तों का सरल भाषा में बोध करा देनेवाला लेख तो इसमें हैं ही, साथ ही कुछ ऐसे लेख हैं जिनमें भ्रातृ-धर्म और पातिव्रत-धर्म पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इससे यह पुस्तक तत्त्व-विचारपूर्ण होने के साथ-साथ सरल, व्यावहारिक शिक्षा देनेवाली और सस्ती होने के कारण सबके काम की वस्तु हो गयी है। मेरी प्रार्थना है कि इस ग्रन्थ को पाठक-पाठिकागण मनन पूर्वक पढ़ें और इससे पूरा लाभ उठावें।

संवत् 1990
गोरखपुर

विनीत हनुमानप्रसाद पोद्दार
(कल्याण-सम्पादक)

नोट-सं. 2048 से तत्त्व-चिन्तामणि भाग-2 दो खण्डों में प्रकाशित की गयी है-प्रथम खण्ड का नाम ‘शीघ्र कल्याण के सोपान’ तथा द्वितीय खण्ड का नाम ‘ईश्वर और संसार’ है।

।।श्रीहरि:।।

विनय


इस दूसरे भाग में भी कल्याण के प्रकाशित लेखों का ही संग्रह है। पहले भाग को लोगों ने अपनाया इसके लिये मैं उनका आभारी हूँ। यहाँ मैं पुन: इस बात को दुहरा देना चाहता हूँ कि मैं न तो विद्वान हूँ और न अपने को उपदेश, आदेश एवं शिक्षा देने का ही अधिकारी समझता हूँ। मैं तो एक साधारण मनुष्य हूँ। श्रीमद्भागवत्गीता और श्रीभगवन्नाम के प्रभाव से मैंने जो कुछ समझा है, उसी का कुछ भाव अन्तर्यामी प्रेरणा से लिखने का प्रयत्न किया गया है वास्तव में यह उस अन्तर्यामी वस्तु है, मेरा इसमें कोई अधिकार नहीं है।
मेरा सभी पाठकों से सविनय निवेदन है कि कृपापूर्वक इन निबन्धों को मन लगाकर पढ़ें और इनमें रही हुई त्रुटियाँ मुझे बतलावें।

विनीत
जयदयाल गोयन्दका

।।ॐ श्रीपरमात्मने नम:।।

मनुष्य का मन प्राय: हर समय सांसारिक पदार्थों का चिन्तन करके अपने समय को व्यर्थ नष्ट करता है। किन्तु मनुष्य जन्म का समय बड़ा ही अमूल्य है। इसलिये ये अपने समय का एक क्षण भी व्यर्थ नष्ट न करके श्रद्धा और प्रेमपूर्वक भगवान् के नाम और रूप का निष्काम भाव से नित्य, निरन्तर स्मरण करना चाहिए। इस समय इससे बढ़कर परमात्मा के कल्याण के लिये दूसरा और कोई भी साधन नहीं है।

एवं दु:खी, अनाथ, आतुर तथा अन्य सम्पूर्ण प्राणियों को साक्षात् परमात्मा का स्वरूप समझकर उनकी मन, तन, धन, जन द्वारा मन इन्द्रियों के संयम पूर्वक निष्काम भाव से तत्परता और उत्साह के साथ सेवा करने से भी मनुष्य का शीघ्र कल्याण हो सकता है।
अतएव मनुष्य को हर समय भगवान के नाम और रूप को याद रखते हुये ही निष्काम भाव से शास्त्रनिहित कर्म तत्परता के साथ करने की चेष्टा करनी चाहिये।

कार्तिक शुक्ला

निवेदक
मु. वाकुड़ा जयदयाल गोयन्दका

।।ॐ श्रीपरमात्मने नम:।।

मनुष्य का कर्तव्य


विचार की दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट ही समझ में आता है कि आजकल संसार में प्राय: सभी लोग आत्मोन्नति की ओर से विमुख-से हो रहे हैं। ऐसे बहुत ही कम लोग हैं जो आत्मा के उद्धार के लिये चेष्टा करते हैं। कुछ लोग जो कोशिश करते हैं उनमें भी अधिकांश किकंर्तव्यविमूढ़ हो रहे हैं। श्रद्धा-भक्ति की कमी के कारण यथार्थ मार्गदर्शक भी अभाव-सा हो रहा है। समय संग और स्वभाव की विचित्रता से कुछ लोग तो साधन की इच्छा होने पर भी अपने विचारों के अनुसार चेष्टा नहीं कर पाते। इसमें प्रधान कारण अज्ञता के साथ-ही-साथ ईश्वर, शास्त्र और महर्षियों पर अश्रद्धा का होना है। परन्तु यह श्रद्धा किसी के करवाने से नहीं हो सकती। श्रद्धा-सम्पन्न पुरुषों के संग और निष्काम-भाव से किये हुए तप, यज्ञ, दान, दया और भगवद्भक्ति आदि साधनों से हृदय के पवित्र होने पर ईश्वर, परलोक, शास्त्र, और महापुरुषों में प्रेम एवं श्रद्धा होती हैं। श्रद्धा ही मनुष्य का स्वरूप है, इस लोक और परलोक में श्रद्धा ही उसकी वास्तविक प्रतिष्ठा है। श्रीगीता में कहा है-


सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स:।।

(17/3)

‘हे भरतवंशी अर्जुन ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्त:करण के अनुरूप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है वह स्वयं भी वही है। अर्थात् जिसकी जैसी श्रद्धा है, वैसा ही उसका स्वरूप समझा जाता है।’ अत: मनुष्य को सच्चे श्रद्धा-सम्पन्न बनने की कोशिश करनी चाहिये।

आप ईश्वर के किसी भी नाम या किसी भी रूप में श्रद्धा करें, आपकी वह श्रद्धा ईश्वर में ही समझी जायगी क्योंकि सभी नाम-रूप ईश्वर के हैं। आपको जो धर्म प्रिय हो, जिस ऋषि, महात्मा या महापुरुष आपका विश्वास हो, आप उसी पर श्रद्धा करके उसी के अनुसार चल सकते हैं। आवश्यकता श्रद्धा-विश्वास की है। ईश्वर, धर्म और परलोक आदि विशेष करके श्रद्धा के ही विषय हैं। इनका प्रत्यक्ष तो अनेक प्रयत्नों के साथ विशेष, परिश्रम करने पर होता है। आरम्भ में तो इन विषयों के लिये किसी-न-किसी विषय पर विश्वास ही करना पड़ता है, ऐसा न करे तो मनुष्य नास्तिक बनकर श्रेय के मार्ग से गिर जाता है, साधन से विमुख होकर पतित हो जाता है।

यदि आपको किसी भी धर्म, शास्त्र अथवा प्राचीन महात्माओं के लेख पर विश्वास न हो, तो कम-से-कम एक श्रीमद्भगवद्गीता पर तो जरूर विश्वास करना चाहिए। क्योंकि गीता का उपदेश प्राय: सभी मतों के अनुकूल पड़ता है। इस पर भी विश्वास न हो तो अपने विचार के अनुसार ईश्वर पर विश्वास करके उसी की शरण होकर साधन में लग जाना चाहिये। कदाचित् ईश्वर के अस्तित्व में भी आपके मन में सन्देह हो तो वर्तमान समय में आपकी दृष्टि में जगत् में जितने श्रेष्ठ पुरुष हैं उन सब में जो आपको सबसे श्रेष्ठ मान्य हों, उन्हीं के बतलाये हुए मार्ग पर कमर कसकर चलना चाहिये।

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